दिल्ली मेट्रो दिल्ली की शान

दिल्ली मेट्रो दिल्ली की शान है, दिल्ली के लोगों की जान हैI मैट्रों के आने से जीवन जीने के तरीके में काफी बदलाव आया है जो कि आज से २० साल पहले कल्पना से परे था.

जब पहली बार मैटो का मसौदा रखा गया तो काफी अलोचना हुई थी 1 किसी ने कहा कि विजली कहा से आएगी किसी ने कहा इतना बड़ा प्राजेक्ट कैसे बनेगा भूमि कहा से आएगी आवास तोड़ने पडेगे. फिर भूमि के अन्दर कैसे खुदाए होगी पर्यावरण संरक्षण वाले समुह भी आलोचना करने लगे भूमिगत जल के स्तर को लेकर भी बाते होने लगी. इन सब समस्या को हल करने के लिए आगे आए एक सर्कत कर्मठ कर्मयोगी मैट्रो मैन के नाम से प्रसिद्ध श्रीधरण सर. उन्होने ना केवल सभी समस्याओं से निजात दिलाई वल्कि समय से पहले प्रोजेक्ट पूरा भी कराया.

फिर पकड़ी मैट्रो ने रफ्तारफिर पकड़ी मैट्रो ने रफ्तार 3 मई 19 9 5 को कम्पनी एकट 1956 के तहत रजिस्टर होने के बाद आज मैट्रो एक मील का पत्थर सावित हो चुका है। शहरी परिवहन में मैट्रो का कोई मुकाबला नही हो सकता.
 8 ट्रेनों से शुरू होकर आज मैट्रोवेड़ा 216 ट्रेनों का हो चुका है। मैट्रो का सव से का फायदा है पर्यावरण सुरक्षा यह बात UN भी मान चुका है। 2OO2 में मैट्रो चली शाहदरा से तीस हजारी के बीच स्वयं तात्कालीन प्रधानमन्त्री श्री अटलबिहारी जी  ने इसका उदघाटन किया. आज 2I3 किमी का सफर 216 ट्रेनो से किया जाता है।
ये सब जो मैने आपको बताया वो ज्यातर लोग जानते ही होगें.


अव में सुनाता हूँ मैट्रो के रोमाचक किस्से. लोग तो लोग ही है गरमी आते ही मेट्रो के अन्दर भी लोगों का स्भाव गरम हो जाता है देखने में आता हैं कि गरमी में ज्यादा वादविवाद होता है मैट्रो में . सीट झपकने की मारामारी हो या किसी के पैर पर चढ़ना ये चीजों को लेकर लडाई बहस भी गरमीयों में वढ़ जाती है. मै हों में देखा जा सकता है कि किस प्रकार हम छोटे से सफर की लड़ झगड़ के काटते है मसलन आज सुबह की बात है एक जनाब मैट्रो में खड़े हुए थे उनकी वगले में मैं खड़ा था. तभी एक महाशय मेरी सामने वाली सीट से उतरने के लिए खड़े हुए .. मैं भी खुश हो गया क्योंकि उत्तमनगर से मण्डी हाऊस तक खडे् .2 मैं भी थक चुका था. अब मुझे वो सीट मिल जाती क्योकि उतरने वाला मेरे सामने से उतर रहा था. अभी मैं सोच ही रहा था कि बगल से आ के भाई साहब सीट पर घस गए. मै तिलमिला उठा अवमुझे क्रोध आ रहा था. मै गुस्से से बोला ये क्या कि हुई? ये मेरी सीट थी ? वह बोला तो क्या हुआ ? यदि में बैठ गया तो? अव मुझसे न रहा गया और मैं बोला सीट मेरे आगे से खाली हुई थी सो मेरा हक है उस पर बैठने का. आपको थोड़ा नियम कायदा सिखना चाहिए. वह बोला भाई फिर क्या हो गया यदि मै बैठ गया तो? मुझे समझ नही आ रहा था कि इसे कैसे समझाऊ? अतः मै क्रोध का घुट पी गया.

लेकिन मैं क्या करता कोई नियम तो नही है मैट्रो के कि यात्री के उतरने पर सीट पर किसका हक है। एक मन तो कर रहा था कि उठाकर पटक हैं पर फिर देखा की सेहत उसकी और मेरी एक जैसी ही है। अत: मै चुप रहा. अब आप मुझे वताएँ अगर आप मेरी जगह होते तो क्या करते? मैं ठीक उसके सामने खड़ा हो गया और क्रोध के भाव भी.. अब आप ही बताएं दोस्तों अगर आप मेरी जगह होते तो क्या करते?

Comments

Popular posts from this blog

The Green Side of Delhi Metro: Sustainability Initiatives and Environmental Impact

Balancing Progress and Public Health: The Impact of Urbanization and Mobility on Infectious Diseases

Behind the Scenes: Unveiling the Operations of Delhi Metro